जेएनयू कैम्पस का मेरा पहला अनुभव



   अपने विश्राम स्थल से चलकर मेट्रो स्टेशन पहुँचा। मुझे पता नहीं था कि जेएनयू कैसे जाएंगे इसलिए मैंने टिकट लेने के दरम्यान इस बात का ज़िक्र भी किया था। पर उसने(टिकट कलेक्टर) नया समझ कर अंतिम स्टेशन तक का टिकट दे दिया। ट्रेन में एक विद्यार्थी ने जेएनयू के करीब के मेट्रो स्टेशन के बारे में बताया। उस स्टेशन का नाम साकेत था। मैं वहाँ उतर गया। वहाँ बस के लिए इंतज़ार कर रहा था कि तभी एक वृद्ध ने जो कि अंधे भी थे मुझसे मदद मांगी। मैं मदद करना चाह रहा था पर मेरी बस पहले आ गई और मैं जाकर बस में बैठ गया। मुझे इस बात का बहुत दुख था कि मैं एक ज़रूरतमंद की मदद नहीं कर सका। कंडक्टर ने मुझे जेएनयू से करीब एक किलोमीटर दूरी पर उतारा। वहाँ से एक गली से मैं जेएनयू की ओर चल पड़ा। मुझे खुशी थी कि मैं दिल्ली में हूँ और जेएनयू के करीब हूँ। उस समय अगर मुझे 5 किमी ० भी चलना पड़ता तो मैं थकता नहीं। चलते- चलते सड़क के दूसरी तरफ हरियाली लिए जंगल जैसा, दिवार से घिरा एक विशेष स्थान दिखाई दिया। मैंने पढ़ा था कि जेएनयू में जंगल है इसलिए मुझे लगने लगा कि मैं अपनी मंजिल के बहुत पास हूँ। मुख्य द्वार पर पहुँचा तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। प्रणाम करने का मेरा मन किया पर मैं इस चाह को दिल में ही दबा लिया क्योंकि मेरे वामपंथी साथियों ने मुु प्रणाम के प्रति मेरे मन में घृणा भर दिया था और इस बात का मुझे अफसोस है । अंदर प्रवेश के लिए नाम, पता और किस काम से आए हैं अंकित करना पड़ता था। इसके बाद मुझे इतने बड़े कैम्पस में हिंदी विभाग खोजना था। एक छात्र (जोकि हिंदी से ही पीएचडी कर रहे थे) ने "स्कूल ऑफ लेंग्वेज" जाने का मार्ग बताया। अंदर पूरा का पूरा कैम्पस पेड़ों से भरा था। कैम्पस की सड़क पर इतनी गाड़ियां चल रही थीं जैसे शहर की मुख्य सड़क हो। 

    "स्कूल ऑफ लेंग्वेज" में जाकर पता चला कि सभी शिक्षकों के अलग अलग कमरे हैं। मैं वहाँ राजेश पासवान सर के कमरे के बारे में पता किया। उनका कमरा तीसरी मंजिल पर था। सीढ़ी पर चढ़ते हुए सोच रहा था कि पता नहीं कैसे बात होगी, वो बात करेंगे भी या नहीं, हमारे कॉलेज के कुछ शिक्षकों की तरह वे भी छात्रों को तुच्छ तो नहीं समझते हैं? यही सब सोचते हुए मैं उनके कमरे के सामने पहुँचा। वहाँ कोई नहीं था। गेट खोला तो देखा सर अपने काम में व्यस्त थे। 

मैंने अपना परिचय दिया। उसके बाद सर ने जो आत्मीयता दिखाई उसका तो मैं कायल हो गया। सर को भी मुझसे मिलकर खुशी हुई ऐसा उनके चेहरे के भाव से लग रहा था। उन्होंने अपना कार्ड दिया जिसपर उनका पता और मोबाइल नंबर लिखा था। उन्होंने प्रवेश परीक्षा से संबंधित कुछ टिप्स भी दिये। उन्होंने मुझे चाय भी पिलाया। उनसे बात करते हुए मैं काफी सहज था और अच्छा महसूस कर रहा था। एक छात्र से भी मेरी पहचान हुई जोकि वहीं से एमफिल कर रहा था। करीब दो घंटे तक सर से बात हुई। फिर मैंने उनसे जाने की अनुमति लिया और कैम्पस में इधर -उधर घूमा। वहाँ के छात्रों के साथ बात करते हुए मैंने जितेंद्र सूना का ज़िक्र किया तो पता चला कि वो अभी घर गए हुए हैं। मैं उनसे नहीं मिल सका इस बात का दुख हुआ फिर भी वहाँ मुझे बहुत मज़ा आ रहा था। 

       कैम्पस से बाहर निकला तो देखा कि एक अंधा व्यक्ति सड़क पार करने की कोशिश कर रहा है। मैंने सड़क पार करने में उसकी मदद की। फिर बस से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।


आनंद प्रवीण 

अक्टूबर, 2019

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