Posts
नीट और नेट की परीक्षा 2024 में धाँधली होने पर
- Get link
- X
- Other Apps
लगन और कठिन परिश्रम से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बाद छात्र जब परीक्षा देने जाते हैं तो उन्हें स्वयं पर भरोसा होता है कि वे इस बार सफल हो जाएंगे। परीक्षा खत्म होने के बाद उनके चेहरे की रौनक और अधिक बढ़ जाती है, पर जैसे ही वे अपने- अपने घर जाते हैं उन्हें गहरा धक्का लगता है, चेहरे की चमक धूमिल हो जाती है, उनके भविष्य पर अंधकार के बादल छाने लगते हैं क्योंकि खबर आती है कि परीक्षा रद्द हो चुकी है। जिस परीक्षा की तैयारी के लिए विद्यार्थी खून पसीना एक कर देते हैं, परिश्रम में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं उसी परीक्षा को कुछ लोग आपराधिक तरीके से, पैसे और पहुँच के बल पर पास करना चाहते हैं। उन्हें किसी की लगन और मेहनत से कुछ लेना-देना नहीं होता है, वे बस सफल होना चाहते हैं और परीक्षा एजेंसियों की लापरवाही के चलते वे इस अन्यायपूर्ण कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम भी दे पाते हैं। पूरे देश में पैसों के बल पर परीक्षा पास करने की लंबी परंपरा बन चुकी है। स्कूल- कॉलेज की सामान्य परीक्षा से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं तक सब में धाँधली की खबरें आम हो चुकी हैं। मध्यप्रदेश में व्यवसायिक परीक्षा मंडल (व...
मुक्ति के लिए रची गई है अजय यतीश की सम्पूर्ण रचनाएं - आनंद प्रवीण
- Get link
- X
- Other Apps
अजय यतीश सर के दोनों काव्य संग्रह 'स्पार्टकस तुम्हारी मेहनत बेकार नहीं गई'(2019) और 'मुक्ति के लिए'(2022) को एक साथ पढ़ने और समझने की कोशिश कर रहा हूँ। ऐसी कोशिश के दो कारण हैं। पहला, स्वयं अजय सर ही लिखते हैं कि पहले काव्य संग्रह को मिले अभूतपूर्व प्रेम से प्रोत्साहित होकर ही मैंने बाद में जो कविताएँ लिखीं वह दूसरे काव्य संग्रह में संकलित हैं। इसी बात को आधार बनाकर प्रसिद्ध आलोचक कँवल भारती जी भी दोनों संग्रहों पर एक साथ समीक्षा लिखते हैं। दूसरा कारण यह है कि दोनों संग्रहों से गुजरते हुए मैंने महसूस किया कि भले ही दोनों संग्रहों के मूल प्रश्न अलग हैं फिर भी दोनों में गहरा संबंध है और इन दोनों प्रश्नों पर एक साथ विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। पहले संग्रह में एक कविता है 'समय' (पृष्ठ संख्या 78) मुट्ठी भर जमीन और चंद रोटी के टुकड़ों के लिए उठाई गई आवाजें बूटों तले रौंद दी जाती हैं सूखे पत्ते की तरह समय की लकीरें जब भी बदलना चाहा मिटा दिये गए वे स्लेट पर उगे शब्दों की तरह लेकिन आखिर कब तक मिटते रहेंगे वे इस तरह ? औ...
अपना हिन्दुस्तान है भैया अपना हिन्दुस्तान
- Get link
- X
- Other Apps
जेब में फूटी कौड़ी नहीं पर चेहरे पर मुस्कान है ये अपना हिन्दुस्तान है भैया अपना हिन्दुस्तान पूरब जाओ पश्चिम जाओ उत्तर जाओ दक्षिण जाओ जहां भी जाओ तुम्हें मिलेगा सड़कों पर नौजवान है ये अपना हिन्दुस्तान है भैया अपना हिन्दुस्तान मंचों से जो ख़्वाब दिखाता ऊँची जुबां में कौन है देश के धन को जेब में रख कर उड़ जाता वो कौन है भूखे- नंगे हालत में भी देश अपना महान है ये अपना हिन्दुस्तान है भैया अपना हिन्दुस्तान फसल कटाई कर जब लौटा चेहरे पर मुस्कान थी अबकी उपज अच्छी हुई दानों में चमक थी, जान थी पर जब आया व्यापारी कौड़ी में बिका अभिमान है ये अपना हिन्दुस्तान है भैया अपना हिन्दुस्तान।
तुम पर खर्च होना चाहता हूँ
- Get link
- X
- Other Apps
Anand pravin मैं तुम पर खर्च होना चाहता हूँ मेरा सबकुछ तुम पर लुटाना चाहता हूँ। मेरी दुनिया तुम्हारे नाम से है तुम्हारे साथ अपनी एक नई दुनिया बसाना चाहता हूँ। मेरे पुर्जे तुम्हारी चाह में कब से हैं प्यासे प्यासी रूह को तुमसे भींगाना चाहता हूँ। मेरी कलाई पर घड़ी की पाबंदी नहीं मेरा हर एक क्षण तुम पर लुटाना चाहता हूँ। मेरी सांसों में तुम्हारे जिस्म की खुशबू मिली है तुम्हारी रूह में मैं अपना घर बनाना चाहता हूँ।