बड़ी भूख थी मेरे मन में तुम्हारी चाहत की,
तुम्हारी बेरुखी ने बेरहमी से उसको मार डाला।
आनंद प्रवीण *मृत्युंजय*
चाँदनी गुम है
चाँद पूरा है फलक पर चाँदनी गुम है रात पूनम की है लेकिन रौशनी कम है. दिल में बेचैनी बहुत है आँख भी नम है चाँद पूरा है फलक पर चाँदनी गुम है. छुप गया वो चाँद जबसे बादलों के पार न कभी आराम आया नींद भी गुम है. उसके घर शहनाई बजी थी हाँथ पीले हुए साथ मेरे तन्हाई चली थी अब तलक संग है. या खुदा अब मौत दे दे ज़िन्दगी खतम है चाँद पूरा है फलक पर चाँदनी गुम है. आनंद प्रवीण, पटना विश्वविद्यालय, पटना.
